जिंदगी की पहचान


जिंदगी की पहचान 
सदियों पहले मनुष्यों को उचित-जीवन जीने का ज्ञान नहीं था। इसीलिए हमलोग जानवरो की तरह रहते थे। हमें असली कर्म-भूमि को प्राप्त करने के लिए अनेको देश, भाषा, विचार मौसम एवं तरह-तरह सामाजिक पालन-पोषण द्वारा आपस में लड़ना-बिखरना इसलिए जरुरी था। क्योंकि दुःख के बाद सुख और अज्ञानता के बाद ज्ञान आता हैं। इस निंदित-गृहीत बिखराव से अनेक रंग-रूप के रहन-सहन द्वारा असली जीने का ज्ञान तो प्राप्त हुआ। लेकिन आपसी जीवन एक सामान न होने से चाहकर भी खुशीपूर्वक जी नहीं सकते। मनुष्यों पर मनुष्यों का अत्याचार एवं जाति-धर्म की लड़ाई से उत्पन्न होने वाले दुःख-दर्द के बिना असली जीवन को समझना मुमकिन नहीं था। आपस में मरने और झगड़ने के कारण भी हमें ज्ञान प्राप्ति हुई हैं की संसार की प्रकृति में सभी मनुष्य एक ही तरह के प्राणी माने गये। इसीलिए हम लोगो का सुखमय जीवन जीने का कर्म और उद्देश्य भी एक ही तरह के हैं। नफरत द्वारा आपस मैं बिखर कर अनेकों प्रकार की नकली ज़िंदगी जीने से हमें असली सुख-शान्ति की प्राप्ति नहीं हो सकती हैं। 

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